एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स (S&P Global Ratings) ने गुरुवार को भारत की सॉवरेन रेटिंग को BBB- से बढ़ाकर BBB कर दिया और दृष्टिकोण (outlook) को स्थिर (Stable) बताया। एजेंसी ने कहा कि भारत दुनिया की “सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक” है।
अमेरिकी रेटिंग एजेंसी (जो दुनिया की सबसे बड़ी है) ने यह कदम 18 साल बाद उठाया है। इससे पहले जनवरी 2007 में उसने भारत की रेटिंग को BBB- किया था।
एसएंडपी विश्लेषकों ने बयान में कहा—
“भारत ने महामारी से शानदार वापसी की है, जहाँ वित्त वर्ष 2022 से 2024 के बीच वास्तविक जीडीपी वृद्धि औसतन 8.8% रही, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक है। हमें उम्मीद है कि यह वृद्धि मध्यम अवधि में भी बनी रहेगी और अगले तीन वर्षों में जीडीपी हर साल औसतन 6.8% बढ़ेगी।”
एसएंडपी देशों की रेटिंग पाँच मुख्य क्षेत्रों के आधार पर करता है:
- संस्थागत (Institutional)
- आर्थिक (Economic)
- बाहरी (External)
- राजकोषीय (Fiscal)
- मौद्रिक (Monetary)
BBB रेटिंग का मतलब है—“देश के पास अपने वित्तीय दायित्वों को पूरा करने की पर्याप्त क्षमता है, लेकिन प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों में इसका असर ज़्यादा पड़ सकता है।”
एसएंडपी (S&P) विश्लेषकों ने भारत पर लगाए गए अमेरिकी टैरिफ को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख अपनाया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले भारत पर 25% टैरिफ लगाया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 50% कर दिया गया। यह कदम नई दिल्ली द्वारा रूस से हथियार और ऊर्जा आयात करने की वजह से उठाया गया था।
हालाँकि कुछ अर्थशास्त्रियों का अनुमान था कि इन टैरिफ के कारण भारत की आर्थिक वृद्धि में 50 बेसिस पॉइंट्स (0.5%) तक की गिरावट आ सकती है, लेकिन एसएंडपी विश्लेषकों ने कहा कि इन टैरिफ का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर “प्रबंधनीय” (manageable) रहेगा।
“भारत अपेक्षाकृत रूप से व्यापार पर कम निर्भर है और इसकी आर्थिक वृद्धि का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा घरेलू खपत से आता है। हमें उम्मीद है कि यदि भारत को रूसी कच्चे तेल का आयात बंद करना पड़े, तो राजकोषीय लागत — यदि सरकार इसे पूरी तरह वहन भी करे — मामूली ही होगी, क्योंकि रूसी कच्चे तेल और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय मानकों (बेंचमार्क) के बीच मूल्य का अंतर बहुत कम है,” एसएंडपी विश्लेषकों ने कहा।
निर्णय का स्वागत करते हुए वित्त मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर पोस्ट किया, “भारत ने राजकोषीय एकीकरण (fiscal consolidation) को प्राथमिकता दी है, साथ ही मज़बूत बुनियादी ढाँचा निर्माण और समावेशी विकास की नीति को बनाए रखा है, जिससे यह अपग्रेड संभव हुआ है। भारत अपनी तेज़ आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार को बनाए रखेगा और आगे और सुधारों के कदम उठाएगा ताकि 2047 तक ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य हासिल किया जा सके।”
सरकार ने पिछले कई वर्षों से तीनों वैश्विक रेटिंग एजेंसियों — एसएंडपी, मूडीज़ रेटिंग्स और फिच रेटिंग्स — से लगातार उच्च रेटिंग की मांग की थी, ताकि देश की आर्थिक बुनियाद का सही प्रतिबिंब मिल सके। वास्तव में, भारत ने पहले कई बार असंतोष जताते हुए कहा था कि इन एजेंसियों की कार्यप्रणाली उभरती अर्थव्यवस्थाओं के ख़िलाफ़ पक्षपाती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 में तो एक पूरा अध्याय शामिल था, जिसका शीर्षक था — “क्या भारत की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग उसकी बुनियाद को दर्शाती है? नहीं!”
हालाँकि भारत अभी भी निवेश-योग्य (investment-grade) रेटिंग की सबसे निचली श्रेणी में है, लेकिन इस अपग्रेड ने उसे प्रतिष्ठित ‘A’ श्रेणी की रेटिंग के एक कदम और करीब पहुँचा दिया है। यह श्रेणी वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक क्रेडिट योग्यता (creditworthiness) का संकेत मानी जाती है।
पीडब्ल्यूसी इंडिया (PwC India) के पार्टनर और इकॉनमिक एडवाइजरी लीडर रानन बनर्जी ने कहा कि इस रेटिंग अपग्रेड से भारत में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा और यह मुद्रा विनिमय दर पर “सकारात्मक प्रभाव” डालेगा। उन्होंने कहा—“इससे सरकार और निजी क्षेत्र दोनों के लिए कुल उधारी लागत में कमी आ सकती है।”
इसे “वैश्विक निवेशकों के लिए एक अहम संकेत” बताते हुए, सचिन सावरिकर, मैनेजिंग पार्टनर, अर्थ भारत इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स IFSC LLP (गिफ्ट सिटी, गुजरात) ने कहा कि एसएंडपी का यह ऐलान महत्वपूर्ण समय पर आया है, क्योंकि यह बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता और अमेरिका के साथ टैरिफ तनाव के बीच हुआ है।
हालाँकि हाल के समय में भारत की जीडीपी वृद्धि दर कुछ धीमी हुई है—2024-25 में दर्ज 6.5% की वृद्धि दर पिछले चार वर्षों में सबसे कम रही, और चालू वित्त वर्ष में भी इसी स्तर पर रहने का अनुमान है (भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार)। फिर भी एसएंडपी ने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि अब “अधिक टिकाऊ स्तर की ओर सामान्य हो रही है और इसमें अच्छा रुझान है।”
एसएंडपी ने यह भी कहा—“हम मानते हैं कि भारत की उच्च वृद्धि दर को लंबे समय तक बनाए रखना ज़रूरी है, ताकि अर्थव्यवस्था पर्याप्त रोज़गार पैदा कर सके, असमानता कम कर सके और अपनी अनुकूल जनसांख्यिकीय स्थिति (favorable demographics) का पूरा लाभ उठा सके।”
महंगाई के मोर्चे पर
एसएंडपी (S&P) ने कहा कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का मुद्रास्फीति प्रबंधन का रिकॉर्ड और बेहतर हुआ है, क्योंकि खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) व्यापक रूप से 2–6% के लक्ष्य दायरे में बनी रही है। बाहरी स्थिति (External Position) को भारत की क्रेडिट प्रोफ़ाइल की एक अहम कड़ी माना गया है, और अनुमान है कि आने वाले वर्षों में चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit) छोटा ही रहेगा।
सार्वजनिक वित्त (Public Finances) में सुधार
सालों से रेटिंग एजेंसियाँ भारत के उच्च राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) और कर्ज़ (Debt Levels) को उसकी प्रमुख कमजोरी मानती रही हैं। हालाँकि एसएंडपी ने गुरुवार को कहा कि आर्थिक सुधार अब “सही रास्ते पर” है, और सरकार अब अपने वित्तीय एकीकरण (Consolidation) का एक और “ठोस खाका” प्रस्तुत कर सकती है।
एसएंडपी के अनुसार, 2025-26 में केंद्र और राज्य सरकारों का सम्मिलित राजकोषीय घाटा जीडीपी का 7.3% रहने का अनुमान है, जो 2028-29 तक घटकर 6.6% पर आ सकता है।
खर्च की गुणवत्ता में सुधार
राजकोषीय घाटे में गिरावट के बावजूद, सरकारी व्यय की गुणवत्ता बेहतर होती दिख रही है। यह उस प्रवृत्ति को जारी रखता है जो पिछले पाँच वर्षों से बनी हुई है, जिसके तहत नए बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) के निर्माण पर धन आवंटन में लगातार वृद्धि हुई है।
केंद्रीय बजट 2025-26 के अनुसार, इस वित्त वर्ष में केंद्र ने 11.21 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) का लक्ष्य रखा है, जो 2019-20 में खर्च किए गए 3.36 लाख करोड़ रुपये से कहीं अधिक है।
एसएंडपी ने कहा—“राज्यों के पूंजीगत व्यय को जोड़ने पर, भारत में कुल सार्वजनिक निवेश जीडीपी का लगभग 5.5% बैठता है, जो अन्य संप्रभु देशों के बराबर या उससे अधिक है। हमें विश्वास है कि भारत में बुनियादी ढाँचे और कनेक्टिविटी में सुधार से वे बाधाएँ दूर होंगी, जो दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि में रुकावट पैदा कर रही हैं।”
ऋण (Debt) के संदर्भ में
एसएंडपी (S&P) का अनुमान है कि भारत का केंद्र और राज्य का सम्मिलित शुद्ध ऋण (Net Debt) 2024-25 में जीडीपी के 83% से घटकर 2028-29 तक 78% रह जाएगा। इससे भारत की स्थिति महामारी-पूर्व स्तरों के करीब पहुँच जाएगी।
केंद्र सरकार ने अपने ऋण-से-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP Ratio) को 2024-25 के 57.1% से घटाकर 2030-31 तक 49-51% के बीच लाने का लक्ष्य तय किया है।
राज्य सरकारों के लिए ऋण का कोई निश्चित लक्ष्य निर्धारित नहीं है। रेटिंग एजेंसियाँ सरकार के ऋण का आकलन केंद्र और राज्यों को मिलाकर (Consolidated Basis) करती हैं।


