उत्तराखंड के सीमांत ज़िले पिथौरागढ़ से हाल ही में सामने आए आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। अब तक यह माना जाता था कि एचआईवी/एड्स (HIV/AIDS) का संक्रमण मुख्य रूप से युवाओं में फैल रहा है, लेकिन ज़िले के स्वास्थ्य विभाग के ताज़ा आँकड़े इस मिथक को तोड़ते हैं। पिथौरागढ़ में कुल 530 एचआईवी संक्रमित मरीज दर्ज किए गए हैं और चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 35 मरीज बुजुर्ग वर्ग (60 वर्ष से अधिक आयु) से ताल्लुक रखते हैं। यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चुनौती है बल्कि समाज को भी सोचने पर मजबूर करती है।
बुजुर्गों में संक्रमण का बढ़ना
एचआईवी संक्रमण को अक्सर असुरक्षित यौन संबंध, नशे के दौरान सुइयों का साझा प्रयोग, संक्रमित खून चढ़ाने या माँ से बच्चे में प्रसार से जुड़ा माना जाता है। अब तक इसका असर युवाओं और मध्यम आयु वर्ग में अधिक देखा जाता रहा है। लेकिन बुजुर्गों में इसका मिलना यह दर्शाता है कि जागरूकता की कमी और असुरक्षित व्यवहार उम्र के किसी भी पड़ाव में संक्रमण का कारण बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समाज बुजुर्गों की यौनिक ज़रूरतों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है, जिसके चलते वे सुरक्षित व्यवहार के प्रति उतनी सतर्कता नहीं बरतते। यही लापरवाही संक्रमण की संभावना बढ़ाती है। साथ ही, प्रवासी मज़दूरी और सीमावर्ती इलाकों में बाहर से आने-जाने वालों के संपर्क में आने से भी जोखिम बढ़ता है।
पिथौरागढ़ की स्थिति
पिथौरागढ़ भौगोलिक दृष्टि से एक सीमावर्ती ज़िला है, जहाँ नेपाल और तिब्बत की सीमा लगी हुई है। यहाँ काम की तलाश में बड़ी संख्या में लोग अन्य राज्यों और देशों की ओर जाते हैं। इस प्रवास के दौरान असुरक्षित संबंध और संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि यहाँ एचआईवी के मामले राज्य के अन्य जिलों की तुलना में अधिक मिल रहे हैं।
530 संक्रमित मरीजों में से अधिकांश युवा और मध्यम आयु वर्ग से हैं, लेकिन 35 वृद्ध संक्रमित मरीज स्वास्थ्य विभाग के लिए नई चुनौती बनकर सामने आए हैं। यह स्थिति साफ़ इशारा करती है कि एचआईवी संक्रमण अब केवल “युवाओं की समस्या” नहीं रह गया है।
स्वास्थ्य विभाग की पहल
स्थानीय स्वास्थ्य विभाग और एचआईवी नियंत्रण सोसाइटी लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। परामर्श केंद्रों (ICTC) और एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी (ART) केंद्रों के माध्यम से मरीजों को नियमित दवाइयाँ और परामर्श दिया जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि एचआईवी की जल्दी पहचान और सही इलाज से मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं।
इसके बावजूद, सबसे बड़ी चुनौती है जागरूकता। खासकर बुजुर्ग वर्ग को लेकर समाज में यह धारणा है कि उन्हें यौन स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ नहीं होतीं, जबकि वास्तविकता इसके उलट है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस आयु वर्ग के लिए भी समय-समय पर परामर्श, टेस्टिंग और सुरक्षित व्यवहार के प्रति जागरूकता की आवश्यकता पर ज़ोर दे रहे हैं।
सामाजिक जिम्मेदारी
एचआईवी अब किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहा है। ऐसे में समाज को यह समझना होगा कि संक्रमण उम्र, जाति, लिंग या क्षेत्र देखकर नहीं फैलता। सुरक्षित जीवनशैली, नियमित टेस्टिंग, असुरक्षित यौन संबंधों से बचाव और समय पर उपचार ही इसका समाधान है।


