अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी का भारत आगमन दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है। यह पहली बार है जब तालिबान शासन का कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि भारत में सात दिनों की आधिकारिक यात्रा पर आया है। यह यात्रा यूनेस्को द्वारा दी गई विशेष अनुमति (exemption) के तहत संभव हुई है, जिससे भारत को कूटनीतिक दृष्टि से बातचीत का अवसर मिला है। यह कदम भारत की बदलती विदेश नीति और अफगानिस्तान के प्रति उसके दृष्टिकोण का संकेत देता है।भारत की अफगान नीति अब केवल मानवीय सहायता तक सीमित नहीं दिख रही।
इस यात्रा के दौरान मुख्य वार्ता के बिंदु होंगे:
- मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण परियोजनाएँ – भारत पहले ही गेहूं, दवाइयाँ और शिक्षा-संबंधी सहायता अफगानिस्तान को प्रदान कर चुका है।
- सुरक्षा सहयोग और आतंकवाद पर बातचीत – भारत के लिए सबसे बड़ा मुद्दा यह सुनिश्चित करना है कि अफगानिस्तान की जमीन भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों, विशेषकर जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा, के लिए सुरक्षित ठिकाना न बने।
- व्यापार और संपर्क – चाबहार पोर्ट और अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ-साउथ ट्रांजिट कॉरिडोर के माध्यम से अफगानिस्तान को जोड़ने की संभावना पर भी चर्चा हो सकती है।
- शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग – भारतीय विश्वविद्यालयों में अफगान छात्रों के लिए छात्रवृत्तियाँ और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बहाली भी एजेंडा का हिस्सा हो सकती है।
भारत के लिए कूटनीतिक लाभ
भारत लंबे समय से अफगानिस्तान में एक प्रमुख विकास भागीदार रहा है। तालिबान शासन आने के बाद भारत ने अपने दूतावास को अस्थायी रूप से बंद कर दिया था, लेकिन मानवीय संपर्क बनाए रखे। मुत्ताकी की यह यात्रा भारत के लिए अवसर है कि वह बिना तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दिए, ‘फंक्शनल एंगेजमेंट’ की नीति अपनाए। इससे भारत अफगान जनता से जुड़ा रह सकता है और भविष्य में बदलती स्थिति के अनुरूप भूमिका निभा सकता है।
पड़ोसी देशों पर असर
- पाकिस्तान: भारत-तालिबान नजदीकी पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय होगी। पाकिस्तान ने अब तक तालिबान को अपनी “रणनीतिक गहराई” के रूप में देखा था। यदि भारत अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति फिर से मजबूत करता है, तो पाकिस्तान की ‘पश्चिमी सीमा सुरक्षा नीति’ प्रभावित हो सकती है।
- चीन: चीन भी अफगानिस्तान में निवेश और सुरक्षा हितों को लेकर सक्रिय है। भारत की बढ़ती भागीदारी से चीन-भारत प्रतिस्पर्धा का नया मोर्चा खुल सकता है।
- ईरान और मध्य एशिया: भारत की यह कूटनीति इन देशों के साथ क्षेत्रीय सहयोग को भी सशक्त कर सकती है, क्योंकि सभी अफगान स्थिरता में रुचि रखते हैं।
क्या यह भारत की कूटनीतिक चाल है?
निश्चित रूप से, यह भारत की एक “संतुलित लेकिन साहसी चाल” है। भारत अभी भी तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता नहीं दे रहा, परंतु व्यवहारिक संपर्क स्थापित कर रहा है। इससे भारत को दोहरा लाभ मिल सकता है—एक ओर वह अफगान जनता के साथ जुड़ा रहेगा, और दूसरी ओर क्षेत्रीय प्रभाव कायम रख सकेगा।
अमीर खान मुत्ताकी की भारत यात्रा दक्षिण एशिया में बदलते समीकरणों की ओर इशारा करती है। यह केवल कूटनीतिक वार्ता नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित साझेदारी का संकेत है। भारत इस यात्रा के माध्यम से यह संदेश दे रहा है कि वह क्षेत्र में शांति, स्थिरता और मानवीय हितों के लिए सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है—भले ही सामने वाला तालिबान ही क्यों न हो।



