नई दिल्ली की ठंडी सुबह थी, लेकिन राजधानी का माहौल उस दिन कुछ अलग था। शांतिपथ पर स्थित अफगान एजेंसी में तालिबान की ओर से आयोजित कांफ्रेस में महिला पत्रकारों कोदिया गया था न्यौता, दुनिया भर की नज़रें टिकी थीं — कैमरे सज चुके थे, पत्रकार अपनी नोटबुक संभाल रहे थे और मंच पर बैठे थे अफगानिस्तान के तालिबान प्रतिनिधि। यह वही प्रेस कॉन्फ्रेंस थी, जो आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में रहने वाली थी।
जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ, माहौल में एक अनकही बेचैनी फैल गई। पहले कुछ औपचारिक सवाल हुए — कूटनीति, व्यापार और सीमा संबंधों पर। लेकिन जल्द ही वह पल आया जिसने इस बैठक को ऐतिहासिक बना दिया। भारतीय महिला पत्रकार ने माइक उठाया और दृढ़ स्वर में पूछा —
“क्या आपकी सरकार अब भी महिलाओं को पढ़ने और काम करने से रोकती है?”
पूरा हॉल कुछ सेकंड के लिए स्तब्ध हो गया। तालिबान मंत्रियों के चेहरे पर झिझक और असहजता साफ़ झलक रही थी। किसी ने जवाब देने की कोशिश की — “हम अपनी संस्कृति के अनुसार काम करते हैं” — पर उस जवाब में न आत्मविश्वास था, न सच्चाई।
पत्रकारों के सवाल लगातार तीखे होते गए। एक ने कहा, “सुरक्षा का नाम लेकर अगर किसी को घर में बंद रखा जाए, तो क्या वह सुरक्षा कहलाती है या कैद?”
इन सवालों ने माहौल को झकझोर दिया। तालिबान प्रतिनिधि जवाब देने से बचते रहे, पर कैमरे सब कुछ कैद कर रहे थे।
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की खास बात यह थी कि यह सिर्फ़ “राजनयिक चर्चा” नहीं थी — यह महिलाओं की आज़ादी बनाम सत्ता की सोच की लड़ाई का मंच बन चुकी थी। दुनिया के लगभग हर बड़े मीडिया हाउस ने इसे लाइव कवर किया — BBC, CNN, Al Jazeera और भारत के तमाम चैनलों ने इसे “ऐतिहासिक संवाद” बताया।
भारतीय पत्रकारों की निर्भीकता ने इस दिन यह साबित कर दिया कि भारत सिर्फ़ लोकतंत्र का दावा नहीं करता, बल्कि उसे जीता भी है।
यह वही ज़मीन है जहाँ सच को दबाने की हर कोशिश सवालों की आवाज़ में गुम हो जाती है।
दिलचस्प बात यह रही कि इस कॉन्फ्रेंस में मौजूद महिला पत्रकारों की उपस्थिति ने खुद एक प्रतीक का काम किया — उन महिलाओं का जो अपनी कलम से उन समाजों की जंजीरों को तोड़ रही हैं, जहाँ अब भी सच्चाई बोलना अपराध माना जाता है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में जब तालिबान प्रतिनिधि बिना ठोस जवाब दिए चले गए, तो एक भारतीय पत्रकार ने धीमे स्वर में कहा —
“सवाल वही सबसे बड़ा हथियार हैं, जिन्हें कोई सत्ता कभी नहीं छीन सकती।”
यह आंखोंदेखी सिर्फ़ एक घटना नहीं थी, बल्कि एक संदेश थी —
कि भारत की पत्रकारिता अब भी ज़िंदा है, और जब दुनिया चुप होती है, तब यहाँ सवाल गूंजते हैं और वही सवाल, किसी दिन इतिहास का रुख़ बदल देते हैं।



