उत्तराखंड सरकार ने आज के समय की सबसे बड़ी चिंता—बच्चों में मोबाइल के बढ़ते प्रभाव—को गंभीरता से समझा है। राज्य के शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग मिलकर ऐसी नीति पर काम कर रहे हैं जो बच्चों को तकनीक के सही और सीमित उपयोग की दिशा दिखा सके। सरकार जल्द ही “मोबाइल पॉलिसी” के रूप में इसे राज्यस्तर पर लागू करने पर विचार कर रही है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्वास्थ्य की रक्षा का संकल्प है।
क्या है यह प्रस्ताव
सरकार ने पाया है कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों के स्वभाव और व्यवहार को गहराई से प्रभावित कर रहा है। ध्यान में कमी, भूलने की आदत, आलस्य और चिड़चिड़ापन अब आम लक्षण बन चुके हैं। बच्चे अब बाहर खेलने या सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से कतराने लगे हैं।
इसलिए शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग मिलकर यह प्रयास कर रहे हैं कि बच्चों को मोबाइल के दुष्प्रभाव के बारे में स्कूल पाठ्यक्रम के माध्यम से जागरूक किया जाए। साथ ही, प्रस्ताव में यह भी शामिल है कि 9 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल न दिया जाए या उनके उपयोग पर सख्त सीमाएँ तय की जाएँ।
विश्व से प्रेरणा
अमेरिका, चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पहले से ही स्कूलों में स्मार्टफोन उपयोग पर नियंत्रण के नियम लागू हैं। उत्तराखंड सरकार इन्हीं सफल उदाहरणों से प्रेरणा लेकर अपने राज्य में ऐसी नीति लाने जा रही है, जो बच्चों के समग्र विकास को केंद्र में रखे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘नो मोबाइल ज़ोन’ की अवधारणा का संदेश दिया था—घर के किसी एक हिस्से को मोबाइल से मुक्त कर, परिवार को जोड़ने का प्रयास। अब उत्तराखंड इस विचार को नीति के रूप में आकार देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
सरकार के प्रारंभिक कदम
राज्य के कई विद्यालयों में पहले से ही कक्षाओं में मोबाइल लाने पर रोक, शिक्षकों द्वारा जागरूकता संवाद, और पालक–बैठक में मोबाइल के प्रभाव पर चर्चा जैसी पहलें शुरू हो चुकी हैं। ये संकेत हैं कि सरकार अब केवल नियम नहीं, बल्कि जन-साझेदारी के साथ एक सकारात्मक आंदोलन खड़ा करना चाहती है।
समाज और परिवार की भूमिका
इस नीति की सफलता केवल सरकार पर नहीं, बल्कि समाज और परिवार पर भी निर्भर करेगी। माता-पिता अगर स्वयं संयम का उदाहरण बनें, तो बच्चे भी उसका अनुसरण करेंगे। इस नीति का उद्देश्य किसी चीज़ पर रोक लगाना नहीं, बल्कि बचपन को बचाना है—वह बचपन जो अब स्क्रीन की रोशनी में धुंधला पड़ता जा रहा है।
बच्चों के हित में एक संतुलित सोच
यह आवश्यक है कि इस नीति में संवेदनशीलता और संतुलन बना रहे। तकनीक को नकारना समाधान नहीं, बल्कि उसका संतुलित उपयोग ही भविष्य का मार्ग है। अगर यह प्रस्ताव नीति के रूप में आता है, तो यह निश्चित रूप से समय की मांग के अनुरूप और उत्तराखंड की दूरदर्शी सोच का प्रतीक होगा।
मोबाइल-स्क्रीन का बढ़ता समय बच्चों की मासूम मुस्कान, ध्यान और सामाजिकता को निगल रहा है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार की यह पहल एक उम्मीद की किरण है—जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज मिलकर बच्चों के भविष्य की रक्षा के लिए खड़े हैं। यह नीति केवल “मोबाइल पर नियंत्रण” नहीं, बल्कि “पीढ़ी पर नियंत्रण खोने से बचाने” का प्रयास है।



