हवा पतली थी, तापमान शून्य के करीब — और सामने थे हिमालय के ऊंचे शिखर।
लेकिन इन सबके बीच भी जब सैकड़ों जोड़ी कदम आगे बढ़े, तो वह सिर्फ दौड़ नहीं, बल्कि जीवन, इच्छाशक्ति और उत्तराखंड की पहचान का उत्सव बन गई।
आदि कैलास क्षेत्र में आयोजित उत्तराखंड की पहली हाई एल्टीट्यूड अल्ट्रा मैराथन ने न सिर्फ इतिहास रचा, बल्कि दुनिया को दिखा दिया कि हिमालय की गोद में रहने वाला हर उत्तराखंडी अपने भीतर एक पर्वत समेटे हुए है।
14,435 फीट पर दौड़ — साहस की पराकाष्ठा
इस अल्ट्रा मैराथन में लगभग 700 धावकों ने भाग लिया। यह केवल शारीरिक ताकत की नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता की परीक्षा थी।
क्योंकि इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, ठंडी हवाएं और कठिन ट्रैक हर कदम को चुनौती बना देते हैं।
फिर भी प्रतिभागियों ने जो जोश और अनुशासन दिखाया, उसने इस आयोजन को “खेल” से आगे बढ़ाकर आस्था और आत्मबल का प्रतीक बना दिया।
पौड़ी की बेटी मीनाक्षी — उत्तराखंड की नई उड़ान
इस मैराथन की सबसे बड़ी प्रेरणा बनी उत्तराखंड की बेटी मीनाक्षी, जिसने अद्भुत प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीता।
पौड़ी की इस युवा धाविका ने जिस दृढ़ संकल्प के साथ ऊंचाई, ठंड और थकान को मात दी, उसने हर महिला और युवा को यह संदेश दिया —
“जहां चाह वहां शिखर भी झुक जाता है।”
मीनाक्षी की जीत केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उत्तराखंड की बेटियों के आत्मविश्वास का प्रतीक बन गई है।
उसने दिखाया कि अगर अवसर मिले तो पहाड़ की बेटियाँ भी आसमान से बात कर सकती हैं।
67 साल के धावक — उम्र नहीं, जज़्बे की दौड़
इस मैराथन की एक और प्रेरक झलक थी — 67 वर्ष के एक प्रतिभागी, जिन्होंने अपनी उम्र को चुनौती देते हुए ट्रैक पूरा किया।
उनके चेहरे की झुर्रियों में अनुभव था, लेकिन आंखों में वही चमक जो किसी 20 साल के खिलाड़ी की होती है।
यह दृश्य हर दर्शक के दिल में उतर गया —
“उम्र नहीं, इच्छाशक्ति ही असली ताकत है।”
पर्यटन और खेल के संगम की मिसाल
इस आयोजन ने उत्तराखंड के एडवेंचर टूरिज्म और स्पोर्ट्स प्रमोशन को नई दिशा दी है।
आदि कैलास क्षेत्र अब सिर्फ धार्मिक या प्राकृतिक पर्यटन केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि अब यह स्पोर्ट्स डेस्टिनेशन के रूप में भी पहचाना जाएगा।
राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की पहल ने यह साबित किया है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो पर्वत भी संभावनाओं का द्वार बन सकता है।
दौड़ केवल जीत की नहीं, पहचान की भी थी
यह अल्ट्रा मैराथन केवल एक खेल आयोजन नहीं थी —
यह उत्तराखंड की आत्मा का उत्सव थी, जहां प्रकृति, परिश्रम और प्रेरणा तीनों का संगम दिखा।
मीनाक्षी जैसी बेटियाँ और सैकड़ों धावक इस बात के प्रतीक हैं कि हिमालय की ऊंचाई केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है।
और जब कोई उसे छूने का साहस करता है —
तो वह केवल मैडल नहीं, बल्कि एक नई सोच, एक नई पहचान और एक नई प्रेरणा लेकर लौटता है।
पहाड़ की रगों में बहता है हौंसला
उत्तराखंड की यह हाई एल्टीट्यूड अल्ट्रा मैराथन आने वाले वर्षों में न सिर्फ खेल पर्यटन को नई दिशा देगी, बल्कि यह याद दिलाएगी कि —
“पर्वतों की रगों में सिर्फ बर्फ नहीं, हौंसले की गर्मी भी बहती है।”
मीनाक्षी और उन सभी धावकों को सलाम, जिन्होंने 14,435 फीट पर भारत की प्रेरणा को नई ऊंचाई दी।



