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Protocol vs Samman: उत्तराखंड के प्रोटोकॉल विवाद की असली कहानी

by Uttar Akhand Jan Manch
November 3, 2025
in National, Uttarakhand
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Protocol vs Samman: उत्तराखंड के प्रोटोकॉल विवाद की असली कहानी

Protocol vs Samman: उत्तराखंड के प्रोटोकॉल विवाद की असली कहानी

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देहरादून में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के स्वागत समारोह के दौरान जो दृश्य सामने आए, उन्होंने उत्तराखंड की राजनीति में एक असहज बहस को जन्म दिया है। जनप्रतिनिधियों को बसों में भेजना और अधिकारियों का अपनी गाड़ियों से एयरपोर्ट पहुँचना, देखने में भले ही प्रशासनिक व्यवस्था लगे, लेकिन इसके भीतर लोकतंत्र की एक गहरी असमानता छिपी हुई है — सम्मान और पद की प्राथमिकता का सवाल।

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घटना का सार : व्यवस्था या असंवेदनशीलता?

राज्य सरकार का कहना है कि सुरक्षा और समयबद्धता के कारण यह व्यवस्था अपनाई गई थी। राष्ट्रपति के दौरे में सुरक्षा सर्वोपरि होती है — यह बात सही है, परंतु सवाल यह है कि क्या सुरक्षा के नाम पर सम्मान की अनदेखी की जा सकती है?
जनप्रतिनिधि न केवल जनता की आवाज़ होते हैं, बल्कि वे लोकतंत्र के जीवंत प्रतीक हैं। अगर उन्हें “बस में ठूंसकर भेजा गया” जैसा अनुभव होता है, तो यह केवल एक प्रोटोकॉल उल्लंघन नहीं, बल्कि जनता के प्रतिनिधित्व के गौरव को चोट पहुँचाने जैसा है।


अधिकारियों और नेताओं के बीच बढ़ती दूरी

इस घटना ने एक पुरानी समस्या को फिर उजागर कर दिया है — प्रशासनिक तंत्र और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच दूरी का बढ़ना।
अक्सर देखने को मिलता है कि अधिकारियों का रवैया “फाइल और सुरक्षा” तक सीमित होता जा रहा है, जबकि नेताओं की भूमिका “प्रतीकात्मक” बनकर रह जाती है।
ऐसे में जब कोई संवेदनशील अवसर — जैसे राष्ट्रपति का दौरा — आता है, तो यह दूरी और भी स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है।
यह केवल व्यवस्था की खामी नहीं, बल्कि संवादहीनता की परिणति है।


राज्य की गरिमा और लोकतंत्र का संतुलन

राष्ट्रपति का दौरा किसी भी राज्य के लिए गौरव का क्षण होता है। यह आयोजन राजनीतिक भेदों से परे होकर एकजुटता और सम्मान का अवसर होना चाहिए।
लेकिन जब इसी मंच पर असंतोष और अपमान की भावना उभरती है, तो राज्य की छवि धूमिल होती है।
सरकार को यह समझना होगा कि “प्रोटोकॉल” तभी सार्थक है जब उसमें मानवता और मर्यादा की भावना हो।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इस घटना पर रिपोर्ट तलब करना स्वागतयोग्य कदम है, परंतु इससे भी अधिक आवश्यक है कि भविष्य में प्रोटोकॉल विभाग, सुरक्षा एजेंसियां और जनप्रतिनिधि एक साझा संवाद तंत्र बनाएं, ताकि ऐसी स्थितियाँ दोबारा न उत्पन्न हों।


लोकतंत्र की आत्मा — सम्मान का संतुलन

लोकतंत्र केवल संविधान या संस्थानों का ढांचा नहीं है, यह उस भावना पर टिका है कि हर प्रतिनिधि का सम्मान समान है।
चाहे वह अधिकारी हो या विधायक — दोनों ही व्यवस्था के आवश्यक स्तंभ हैं। जब इन स्तंभों के बीच संतुलन बिगड़ता है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है।

यह घटना इसलिए भी याद रखी जाएगी क्योंकि इसने हमें यह सोचने पर विवश किया है कि —

“क्या हम प्रोटोकॉल निभा रहे हैं, या केवल पद की प्राथमिकता बचा रहे हैं?”

उत्तराखंड प्रशासन को अब केवल रिपोर्ट नहीं, बल्कि सुधार की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।
प्रोटोकॉल से बढ़कर लोकतंत्र का सार है — सम्मान और संवाद।
अगर यह संतुलन पुनः स्थापित होता है, तो राष्ट्रपति मुर्मु का यह दौरा केवल “इतिहास” नहीं, बल्कि “सीख” भी बन जाएगा।

Uttar Akhand Jan Manch

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