
बैंकॉक/नोम पेन्ह:
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच तनाव अपने चरम पर है। एक ओर दोनों देशों के प्रधानमंत्री आज मुलाकात करने वाले हैं, वहीं दूसरी ओर बॉर्डर पर लगातार संघर्ष और मौतें जारी हैं। यह टकराव अब केवल कूटनीति या सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी में बदल चुका है।
BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, कंबोडिया के प्रधानमंत्री ने बातचीत से कुछ घंटे पहले “तत्काल संघर्षविराम” की मांग की, लेकिन थाईलैंड ने इसकी नियत पर सवाल उठा दिए। Reuters ने बताया कि थाई पक्ष को लगता है कि कंबोडिया केवल वार्ता से पहले अंतरराष्ट्रीय दबाव कम करने के लिए यह बयान दे रहा है, जबकि जमीनी हालात कुछ और कह रहे हैं।
इसी बीच एक दिल तोड़ने वाली खबर The Guardian से सामने आई। थाईलैंड की सीमा के पास एक आम नागरिक अपनी पत्नी और बच्चों के साथ कुछ सामान लेने निकला था — वे कभी घर लौट नहीं पाए। गोलीबारी में तीनों की जान चली गई। पीड़ित व्यक्ति का बयान — “जैसे मेरी आत्मा का एक हिस्सा चला गया हो” — इस विवाद की मानवीय कीमत को साफ दिखाता है।
Mint की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद इस मसले को शांतिपूर्वक सुलझाने के लिए कूटनीतिक पहल कर रहे हैं। लेकिन यह सवाल अब सामने आ रहा है — क्या ये डील भी सिर्फ एक ग्लोबल ड्रामा है? क्या दोनों देश सिर्फ दिखाने के लिए मिल रहे हैं, जबकि असली इरादा अपनी ताकत दिखाना है?
Al Jazeera और New York Times ने इस झगड़े का पूरा टाइमलाइन और ऐतिहासिक संदर्भ दिया है — 2022 से ही यह तनाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था, और अब यह उबल चुका है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है:
- क्या थाईलैंड और कंबोडिया वाकई शांति चाहते हैं या यह सिर्फ कूटनीतिक मजबूरी है?
- आम लोगों की जान की कीमत पर यह शक्ति प्रदर्शन कब तक चलता रहेगा?
- क्या ट्रंप जैसे नेता वास्तव में मदद करेंगे या सिर्फ अपनी छवि चमकाएंगे?
आज की बैठक पर सारी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। लेकिन असली शांति तभी आएगी जब दोनों देश एक-दूसरे पर शक छोड़कर आम लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देंगे।


