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Home Uttarakhand Haridwar

आईआईटी रुड़की ने बनाया बाढ़ से फैलने वाली बीमारियों पर नज़र रखने का टूल, दिल्ली की बाढ़ में किया गया परीक्षण

by Uttar Akhand Jan Manch
August 25, 2025
in Haridwar, Science
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आईआईटी रुड़की ने बनाया बाढ़ से फैलने वाली बीमारियों पर नज़र रखने का टूल, दिल्ली की बाढ़ में किया गया परीक्षण
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आईआईटी रुड़की ने बाढ़ से फैलने वाली बीमारियों पर नज़र रखने के लिए एक नया टूल विकसित किया है, जिसे 2023 की दिल्ली बाढ़ के दौरान परखा गया।

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इस मॉडल ने यह दिखाया कि किस तरह ई-कोलाई जैसे सूक्ष्म जीव पानी में फैलते हैं और किन क्षेत्रों में संक्रमण का ख़तरा ज़्यादा है। इस जानकारी के आधार पर नागरिक एजेंसियों को समय रहते कदम उठाने का अवसर मिला, जिससे समुदायों में बड़े पैमाने पर बीमारी फैलने से रोका जा सके।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की ने एक नया टूल विकसित किया है, जो केवल यह नहीं दिखाता कि बाढ़ का पानी कहाँ-कहाँ फैलता है, बल्कि उससे आगे जाकर यह भी बताता है कि बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्म जीव पानी में किस तरह से फैलते हैं और किन इलाक़ों में सबसे ज़्यादा ख़तरा है।

इस सिस्टम का नाम “HyEco” रखा गया है।

इस मॉडल को 2023 की दिल्ली बाढ़ के दौरान परखा गया। नतीजे चिंताजनक थे। बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में से 60 प्रतिशत से अधिक इलाक़े उच्च या अति-उच्च ख़तरे वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किए गए।

भारत के शहरों में आने वाली बाढ़ अक्सर बारिश के पानी को बिना उपचारित सीवेज और औद्योगिक कचरे के साथ मिला देती है। इससे गंभीर स्वास्थ्य ख़तरे पैदा हो जाते हैं। ऐसे हालात में दस्त और हैजा जैसी बीमारियाँ बहुत तेजी से फैलती हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि HyEco अधिकारियों को यह अवसर देता है कि वे किसी बीमारी के फैलने से पहले ही कार्रवाई कर सकें।

यह टूल “स्वास्थ्य ख़तरे वाले हॉटस्पॉट” की पहचान कर सकता है और नागरिक एजेंसियों को उन इलाक़ों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है। इसका इस्तेमाल निवासियों को एसएमएस अलर्ट भेजने, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को बेहतर बनाने, मानसून से पहले नालियों की सफ़ाई करने और यहाँ तक कि आपातकालीन जल-शोधन कार्यों को दिशा देने में भी किया जा सकता है।

आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर मोहित पी. मोहंती ने कहा – “बाढ़ सिर्फ इमारतों को नुकसान नहीं पहुँचाती, बल्कि यह एक ख़ामोश स्वास्थ्य संकट भी पैदा कर सकती है। HyEco हमें यह ताक़त देता है कि हम देख सकें कहाँ सबसे बड़ा ख़तरा है, ताकि बहुत देर होने से पहले कार्रवाई की जा सके।”

आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर कमल किशोर पंत ने कहा कि यह काम केवल अकादमिक शोध तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा – “यह समाज की सेवा करने वाला विज्ञान है। बाढ़ के दिखाई देने वाले और छिपे हुए खतरों के लिए शहरों को तैयार करके, HyEco सुरक्षित और स्वस्थ समुदाय बनाने में मदद कर सकता है।”

राष्ट्रीय मिशनों और सतत विकास लक्ष्यों से जुड़ा टूल

यह मॉडल कई सरकारी कार्यक्रमों का भी समर्थन करता है, जैसे –

  • राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन
  • स्वच्छ भारत मिशन
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन

वैश्विक स्तर पर यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से भी जुड़ता है, जिनमें स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य, सतत शहर और जलवायु कार्रवाई शामिल हैं।

यह प्रणाली केवल भारत तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग किसी भी बाढ़-प्रवण शहर में किया जा सकता है – चाहे वह मुंबई हो या मनीला, जकार्ता हो या न्यू ऑरलियन्स। टीम का कहना है कि यह मॉडल शहरी बाढ़ के बाद होने वाले स्वास्थ्य खतरों को कम करने का एक ठोस उपाय प्रदान करता है।

जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण भारी बारिश और अधिक विनाशकारी बाढ़ आती जा रही है, बड़ा ख़तरा केवल डूबे हुए घर नहीं हैं, बल्कि वह सूक्ष्म जीवाणु भी हैं जो पानी के साथ फैलते हैं। HyEco उसी अनदेखे ख़तरे की ओर इशारा करता है।

Uttar Akhand Jan Manch

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