एआई अब संगीत उद्योग के लिए कोई नई चीज़ नहीं है, लेकिन जो कभी केवल रीमिक्स बनाने का मज़ेदार साधन था, वह अब एक गंभीर रूप ले चुका है। आज हालात ऐसे हैं कि संगीतकार नींद से उठते हैं और पाते हैं कि उनके नाम से पूरे एल्बम रिलीज़ हो चुके हैं, जबकि उन्होंने कभी स्टूडियो में क़दम भी नहीं रखा।
एआई से बने गानों ने संगीत की दुनिया में पहचान और रचनात्मकता को लेकर गंभीर नैतिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल ही में इंग्लैंड की मशहूर फोक सिंगर एमिली पोर्टमैन तब दंग रह गईं जब उनके प्रशंसकों ने उन्हें नए एल्बम Orca की बधाई दी। चौंकाने वाली बात यह थी कि उन्होंने ऐसा कोई एल्बम बनाया ही नहीं था। पूरा एल्बम एआई-जनरेटेड था, जिसे स्पॉटिफ़ाई, आईट्यून्स और यूट्यूब पर उनके नाम से अपलोड कर दिया गया था। इसने श्रोताओं को धोखा दिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स को इस पर कार्रवाई करने में हफ़्तों लग गए। इतना ही नहीं, एल्बम हटाए जाने के कुछ दिन बाद उनके प्रोफ़ाइल पर एक और नकली एल्बम अपलोड हो गया।
हालाँकि, एमिली पोर्टमैन अकेली कलाकार नहीं हैं जिन्हें एआई ने क्लोन किया है। कई अन्य कलाकारों के नाम से भी एआई-जनरेटेड ट्रैक सामने आए हैं, जिनमें दिवंगत संगीतकार ब्लेज़ फोली और गाय क्लार्क शामिल हैं।
भारत में भी यह ट्रेंड पहुँच चुका है। मशहूर गायक किशोर कुमार का नाम इसमें घसीटा गया, जब बॉलीवुड के लोकप्रिय गीत “सैयाँरा” का एक वर्ज़न ऑनलाइन फैलाया गया और इसे झूठा प्रचारित किया गया कि यह “मूल” गाना किशोर कुमार ने गाया है। हक़ीक़त यह है कि उन्होंने यह गीत कभी गाया ही नहीं। यह ट्रैक पूरी तरह एआई-जनरेटेड है, जिसे वॉइस-क्लोनिंग तकनीक का इस्तेमाल कर उनकी आवाज़ की नकल करके तैयार किया गया।
जो कभी मज़ेदार एआई रीमिक्स के रूप में शुरू हुआ था, वह अब कलाकारों की पहचान चुराने का ज़रिया बन गया है। ठग इससे पैसा कमा रहे हैं, जबकि असली गायक और संगीतकार अपने ही काम को साबित करने के लिए जूझने पर मजबूर हैं।
इस समस्या का पैमाना चौंकाने वाला है। स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म डीज़र ने हाल ही में खुलासा किया कि उसे हर दिन लगभग 20,000 एआई-जनरेटेड गानेमिलते हैं—जो तीन महीने पहले की तुलना में लगभग दोगुना है। कंपनी के चीफ़ इनोवेशन ऑफिसर ऑरेलियन हेरॉल्ट ने अप्रैल 2025 में फोर्ब्स को दिए बयान में कहा – “एआई-जनरेटेड कंटेंट लगातार डीज़र जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म पर बाढ़ की तरह आ रहा है और हमें इसके धीमा पड़ने के कोई संकेत नहीं दिख रहे।”
करीब 1 लाख अपलोड रोज़ाना होने के कारण ज़्यादातर प्लेटफ़ॉर्म थर्ड-पार्टी डिस्ट्रीब्यूटर्स और यूज़र-सबमिटेड डेटा पर निर्भर रहते हैं। यही वजह है कि स्कैमर्स के लिए नकली गानों को असली कलाकारों की प्रोफ़ाइल में डालना आसान हो जाता है—जब तक कि फैंस इसे पकड़कर शिकायत न करें। यह ख़तरा उन छोटे, स्वतंत्र संगीतकारों के लिए और भी बड़ा है, जिनके पास मज़बूत कानूनी टीमें नहीं होतीं।
यह कहना ग़लत होगा कि संगीत में एआई पूरी तरह बुरा है। यह कलाकारों की मदद कर सकता है—जैसे नए गीतों के बोल सोचने में, कॉर्ड प्रोग्रेशन सुझाने में या अलग-अलग ध्वनियों के साथ प्रयोग करने में। लेकिन जब इसका इस्तेमाल असली गायकों की नकल करके किया जाता है, तो यह सीधा धोखाधड़ी बन जाता है। जैसे-जैसे लोग मौलिकता के बजाय सुविधा को ज़्यादा महत्व देने लगते हैं, ख़तरा और स्पष्ट हो जाता है। नतीजतन हमें असली एल्बमों की जगह और ज़्यादा एआई-जनित बेकार संगीत (AI sludge) मिल सकता है।
आज संगीत उद्योग अपने सबसे बड़े “रीमिक्स” का सामना कर रहा है—यह तय करने का कि ऐसी उम्र में रचनात्मकता की रक्षा कैसे की जाए, जब यहाँ तक कि मृत कलाकार भी एक “नया” ट्रैक रिलीज़ कर सकते हैं।



