सनातन परंपरा (Sanatan Tradition) और साधु-संतों की आस्था से जुड़ी जूना अखाड़े की पवित्र छड़ी यात्रा (Holy Chhari Yatra of Juna Akhara) केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह faith, culture and spiritual preservation का प्रतीक है। जब भी यह यात्रा निकलती है, तो साधु-संतों, भक्तों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। डमरू की गूंज, शंखनाद और “हर-हर महादेव” के जयकारों से वातावरण पूर्ण रूप से शिवमय हो जाता है।
जूना अखाड़ा (Juna Akhara) देश के 13 प्रमुख अखाड़ों में से एक है और इसे सबसे बड़ा और प्रभावशाली अखाड़ा माना जाता है। इसका मुख्यालय Haridwar में स्थित है, जबकि इसकी शाखाएं पूरे भारत में फैली हुई हैं। अखाड़े की पवित्र छड़ी, जिसे “Chhari Mubarak” कहा जाता है, भगवान शिव की उपासना का प्रतीक मानी जाती है। यही वह छड़ी है जिसे अखाड़े के महामंडलेश्वर और साधु-संत बड़ी श्रद्धा के साथ लेकर धार्मिक यात्राओं पर निकलते हैं।
छड़ी यात्रा की कहानी (The Story Behind the Holy Chhari Yatra)
इस यात्रा की परंपरा सदियों पुरानी (centuries old) है। मान्यता है कि भगवान शिव के अनन्य भक्त आदिगुरु दत्तात्रेय (Adiguru Dattatreya) ने इस छड़ी को सन्यासियों को धर्म रक्षा (protection of dharma) के प्रतीक के रूप में प्रदान किया था। कहा जाता है कि यह छड़ी भगवान की शक्ति और संरक्षण का प्रतीक है, जो साधु-संतों को धर्म की राह पर दृढ़ता से चलने की प्रेरणा देती है। समय के साथ यह परंपरा अखाड़ों द्वारा अपनाई गई और हर वर्ष विशेष अवसरों पर यह यात्रा निकाली जाने लगी।
इस यात्रा का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज तक धर्म, सदाचार और एकता का संदेश पहुंचाना है। यात्रा के दौरान अखाड़े के संत विभिन्न तीर्थस्थलों (pilgrimage sites), मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर रुककर pooja, satsang and spiritual discourses आयोजित करते हैं।
यात्रा का उद्देश्य और महत्व (Purpose and Significance of the Yatra)
जूना अखाड़े की पवित्र छड़ी यात्रा का मुख्य उद्देश्य spreading the living traditions of Sanatan Dharma है। यह यात्रा लोगों को यह संदेश देती है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन को truth (सत्य), service (सेवा) और discipline (संयम) के मार्ग पर चलाने की प्रेरणा देती है।
इसके अलावा, यह यात्रा साधु-संतों और समाज के बीच spiritual dialogue का माध्यम भी बनती है। यात्रा के दौरान साधु environmental awareness, cow protection, drug de-addiction, and nation building जैसे विषयों पर भी जनजागरण करते हैं। कई बार यह यात्राएं Kumbh Mela या Mahashivratri जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों की तैयारी का हिस्सा भी होती हैं।
यात्रा के दौरान अखाड़े के महामंडलेश्वर और नागा साधु विशेष पूजा विधि से छड़ी का abhishek (ritual bathing) करते हैं और फिर यह छड़ी एक स्थान से दूसरे स्थान तक जुलूस (procession) के रूप में बढ़ती है। रास्ते में लोग फूलों की वर्षा कर स्वागत करते हैं और “Bam Bam Bhole” के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है।
आस्था और संस्कृति का संगम (Union of Faith and Culture)
यह छड़ी यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि a living symbol of India’s ancient traditions and unity है। इसमें भाग लेने वाले श्रद्धालु इसे भगवान शिव से जुड़ने का एक अद्भुत अवसर मानते हैं।
जूना अखाड़े की यह पवित्र छड़ी यात्रा जहां भी जाती है, वहां devotion, energy, and cultural harmony का वातावरण बन जाता है। यह यात्रा न केवल आस्था की प्रतीक है, बल्कि समाज को जोड़ने और सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने का सशक्त माध्यम भी है।
