हरिद्वार में अगले कुंभ मेले की तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं। हाल ही में मेला प्रशासन ने एक नई पहल की घोषणा की है, जिसके अंतर्गत पेरिस की तर्ज पर लगभग 4 किलोमीटर लंबा पॉथ वे निर्माण किया जाएगा। 4 किलोमीटर लंबा मार्ग आर्यनगर से वाल्मीकि चौक तक बनाया जाएगा। जो हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आसान, सुरक्षित और सुंदर पैदल मार्ग प्रदान करेगा। सवाल यह है कि क्या इसे अर्द्ध कुंभ मेले की तैयारी का हिस्सा माना जाए है या फिर विकास का एक नया “अध्याय।
मेला प्रशासन का दावा है कि इस पॉथ वे से लाखों श्रद्धालुओं को चलने में सुविधा होगी, भीड़ का दबाव कम होगा और सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होगी। मार्ग के दोनों ओर सोलर लाइटें, सीसीटीवी कैमरे, शेड और विश्राम स्थल बनाने की योजना है। अगर इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो यह निश्चित रूप से श्रद्धालुओं के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है।
पेरिस की तर्ज पर पॉथ वे यानि पैदल मार्ग जैसी उपमा आकर्षक लगती है, पर यह भी एक प्रश्न खड़ा करती है क्या हम अपने पारंपरिक धार्मिक आयोजनों में विदेशी नामों का सहारा लेकर विकास का भ्रम पैदा कर रहे हैं? भारत की धार्मिक आस्थाओं और तीर्थ परंपराओं की अपनी मौलिक पहचान है। ऐसे में “पेरिस जैसा” कहकर क्या सरकार एक आधुनिकता का दिखावा तो नहीं कर रही? असल मुद्दा तो यह है कि पैथवे का निर्माण वास्तविक ज़रूरत और व्यावहारिकता के आधार पर हो, न कि केवल प्रचार के उद्देश्य से।
अर्धकुंभ की तैयारियों की शुरुआत
अर्धकुंभ 2027 के लिए हरिद्वार में प्रशासनिक हलचल तेज़ हो चुकी है। सफाई व्यवस्था, बिजली आपूर्ति, पानी की उपलब्धता, यातायात नियंत्रण और डिजिटल प्रबंधन सिस्टम पर काम शुरू हो गया है। मेला क्षेत्र के पुनर्विकास के साथ ही कई पुराने घाटों की मरम्मत और नए प्रवेश द्वारों का निर्माण भी जारी है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस परियोजना को “नए उत्तराखंड” की झलक बताते हैं। सरकार दावा कर रही है कि कुंभ के आयोजन को पर्यावरण-संवेदनशील, स्वच्छ और तकनीकी रूप से उन्नत बनाया जाएगा। लेकिन वास्तविक चुनौती है कि इन योजनाओं को समय पर और पारदर्शी ढंग से पूरा करना। पिछले कुंभों में हमने देखा कि कागज़ पर बनी योजनाएँ ज़मीन पर अधूरी रह जाती हैं। इसलिए इस बार जनता और संत समाज की उम्मीदें कहीं अधिक हैं।
अर्द्ध कुंभ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। इसमें करोड़ों श्रद्धालु आते हैं, और हर बार यह आयोजन देश की प्रशासनिक क्षमता और संसाधन प्रबंधन की परीक्षा बन जाता है। पॉथ वे जैसी योजनाएँ तभी सफल होंगी जब उनका क्रियान्वयन ईमानदारी और ज़रूरत के अनुसार हो।
हरिद्वार में पेरिस जैसा पॉथ वे सुनने में भले ही आधुनिकता की झलक दे, लेकिन इसका असली मकसद श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा होनी चाहिए। अर्धकुंभ की तैयारियाँ वास्तव में शुरू हो चुकी हैं, और अब धामी सरकार के लिए यह मौका है कि वह वादों से आगे बढ़कर कार्य के स्तर पर अपनी प्रतिबद्धता साबित करे। विकास का अर्थ केवल चमक-दमक नहीं, बल्कि वह सुविधा है जो आम जन तक पहुँचे।



