चार दिवसीय लोकआस्था का पर्व छठ महापर्व इस वर्ष शनिवार से अनुराधा नक्षत्र और शोभन योग में नहाय-खाय के साथ प्रारंभ होगा। इस दिन व्रती गंगा या किसी पवित्र जलाशय में स्नान कर शुद्धता और संयम का संकल्प लेते हैं। भगवान भास्कर (सूर्य देव) को अर्घ्य देकर नहाय-खाय का प्रसाद बनाते हैं जिसमें अरवा चावल, चना दाल और कद्दू की सब्जी पारंपरिक रूप से शामिल रहती है। यही प्रसाद पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
पर्व की पारंपरिक प्रक्रिया
छठ व्रत चार दिनों तक चलता है—
- नहाय-खाय (पहला दिन): व्रती स्नान कर शुद्ध भोजन करते हैं और घर में पवित्रता का वातावरण बनाते हैं।
- खरना (दूसरा दिन): दिनभर निर्जला उपवास के बाद शाम को गुड़ से बनी खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
- संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन): अस्त होते सूर्य को नदी या तालाब के किनारे अर्घ्य दिया जाता है। महिलाएँ पीत वस्त्र धारण कर गीत गाती हैं—“केलवा के पात पर, उगले सूरज देव।”
- प्रातः अर्घ्य (चौथा दिन): उदय होते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन होता है। यह क्षण लोकगीतों और श्रद्धा की गूंज से संपूर्ण वातावरण को पवित्र कर देता है।
ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि
छठ पर्व की उत्पत्ति वैदिक युग से मानी जाती है। ऋग्वेद में सूर्य उपासना और उषा देवी की वंदना के उल्लेख मिलते हैं। ऐसा विश्वास है कि त्रेतायुग में माता सीता ने रामराज्य स्थापना के बाद छठ व्रत किया था। इसी परंपरा को बाद में जन-जन ने अपनाया। सूर्य की उपासना न केवल आरोग्य के लिए बल्कि आत्मशुद्धि और सामूहिक एकता के प्रतीक के रूप में की जाती है।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
आज जब पर्यावरणीय संकट, प्रदूषण और मानसिक असंतुलन जैसी चुनौतियाँ बढ़ रही हैं, छठ पर्व प्रकृति और मानव के सामंजस्य की भावना को सुदृढ़ करता है। इस पर्व में सूर्य, जल और धरती—तीनों तत्वों की पूजा की जाती है, जो जीवन के मूल आधार हैं। व्रत के दौरान स्वच्छता, संयम, सामूहिकता और निःस्वार्थ भक्ति का जो भाव देखा जाता है, वह आधुनिक समाज को सादगी और अनुशासन की प्रेरणा देता है।
युवाओं के दृष्टिकोण से
आज के युवा वर्ग के लिए छठ केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक ऊर्जा का उत्सव है। सोशल मीडिया के युग में भी युवा इस पर्व को डिजिटल रूप से जोड़ते हुए अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा ले रहे हैं। छठ की इको-फ्रेंडली और जेंडर-समानता आधारित भावना (जहां पुरुष और महिलाएं समान रूप से व्रत करते हैं) आज के सामाजिक संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
छठ महापर्व भारतीय लोकजीवन की सादगी, समर्पण और पर्यावरण-संवेदनशीलता का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व न केवल सूर्य की उपासना का अवसर है, बल्कि स्वच्छ मन, शुद्ध आचरण और सामूहिक कल्याण की भावना का प्रतीक भी है। आज के समय में जब मनुष्य अपनी जड़ों से दूर जा रहा है, छठ उसे फिर से प्रकृति, परंपरा और आत्मनियंत्रण से जोड़ने का सुंदर माध्यम बनकर सामने आता है।



