हरियाणा के एक छोटे से गाँव पेतवार से निकलकर देश के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचना — यह कोई सामान्य यात्रा नहीं। यह कहानी है न्यायमूर्ति सूर्यकांत की, जिन्होंने सीमित साधनों, कठिन परिस्थितियों और संघर्षों के बावजूद अपनी लगन, शिक्षा और ईमानदारी के बल पर भारतीय न्याय व्यवस्था में ऊँचा मुकाम हासिल किया। उनका जीवन आज के युवाओं के लिए एक जीवंत प्रेरणा है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और निष्ठा अटूट, तो कोई बाधा मंज़िल रोक नहीं सकती।
संघर्ष से साधना तक
10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार ज़िले के पेतवार गाँव में जन्मे सूर्यकांत का बचपन सादगी और संघर्ष से भरा था। गाँव में शिक्षा के सीमित साधन थे, लेकिन ज्ञान के प्रति उनका उत्साह कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने सरकारी स्कूल से प्रारंभिक पढ़ाई की, हिसार के गवर्नमेंट कॉलेज से स्नातक किया और फिर महार्षि दयानंद विश्वविद्यालय (रोहतक) से एलएल.बी. की डिग्री प्राप्त की। बाद में उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एल.एल.एम. में प्रथम स्थान हासिल कर दिखाया कि प्रतिभा साधनों की नहीं, संकल्प की मोहताज होती है।
न्यायिक यात्रा की ऊँचाइयाँ
1984 में उन्होंने वकालत की शुरुआत की और 2000 में हरियाणा के एडवोकेट जनरल बने — उस समय वे राज्य के सबसे युवा एडवोकेट जनरल थे।
2004 में उन्हें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाया गया, 2018 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और 2019 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत हुए।
आज वे भारत के भावी मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में देखे जा रहे हैं — यह उस व्यक्ति की सफलता है जिसने गाँव के धूलभरे रास्तों से न्याय के सर्वोच्च पथ तक पहुँच बनाई।
उनके फैसलों की दिशा — समाज और न्याय का संतुलन
जस्टिस सूर्यकांत के फैसले केवल कानून तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की आत्मा से जुड़े हैं।
उन्होंने साझा संसाधनों (तालाब, पोखर आदि) की रक्षा को “जीवन के अधिकार” का हिस्सा माना।
उन्होंने जेल सुधार, मानवाधिकार और पर्यावरण जैसे विषयों पर गहरी संवेदनशीलता दिखाई।
उनके निर्णय यह संदेश देते हैं कि न्याय केवल दंड नहीं, बल्कि समाज में संतुलन और सुधार की प्रक्रिया है।
आज के युवाओं के लिए प्रेरणा
जस्टिस सूर्यकांत की यात्रा आज के युवाओं के लिए अनेक संदेश देती है —
- साधन नहीं, सोच बड़ी बनाओ: उन्होंने सीमित संसाधनों में भी कभी हार नहीं मानी।
- शिक्षा ही परिवर्तन का आधार है: गाँव के स्कूल से पढ़कर भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
- ईमानदारी और निष्ठा सर्वोपरि हैं: उन्होंने सत्ता से नहीं, सिद्धांतों से ताकत पाई।
- सफलता अकेले की नहीं, समाज की होती है: उनके फैसले हमेशा आमजन के हित में रहे।
जस्टिस सूर्यकांत की कहानी इस युग के हर युवा को यह सिखाती है कि सफलता सिर्फ शहरों या संपन्न परिवारों की देन नहीं। अगर भीतर आग है, लक्ष्य स्पष्ट है और कर्म ईमानदार हैं, तो गाँव की पगडंडियों से भी सुप्रीम कोर्ट की सीढ़ियाँ चढ़ी जा सकती हैं।



