क्या कमजोर नींव झेल पाएगी लाखों श्रद्धालुओं का भार?
हरिद्वार में 2027 में आयोजित होने वाला अर्धकुंभ मेला भारत की आस्था, अध्यात्म और परंपरा का सबसे बड़ा आयोजन है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय आयोजन है जहाँ लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए जुटते हैं। लेकिन हाल ही में सामने आई एक गंभीर समस्या ने प्रशासन और जनता दोनों की चिंताओं को बढ़ा दिया है — गंगनहर पर बन रहे घाटों की नींव में दरारें और धंसाव दिखने लगे हैं।
गुणवत्ता पर उठे सवाल
मेला क्षेत्र में चल रहे घाट निर्माण कार्य की तस्वीरें और रिपोर्टें दर्शाती हैं कि कई स्थानों पर नींव में दरारें आ गई हैं और कुछ जगहों पर धंसाव भी देखा गया है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब यह कार्य अभी निर्माणाधीन अवस्था में ही है।
यदि अभी से नींव कमजोर दिखने लगी है, तो आने वाले वर्षों में जब लाखों श्रद्धालु इन घाटों पर एक साथ स्नान करेंगे, तब यह भार कैसे झेल पाएंगे — यह बड़ा प्रश्न है।
प्रशासन की कार्रवाई
मेला अधिकारी ने स्थिति का निरीक्षण कर संबंधित विभागों को जांच के आदेश दिए हैं। इंजीनियरिंग और निर्माण एजेंसियों से रिपोर्ट मांगी गई है। प्राथमिक जांच में यह आशंका जताई जा रही है कि नींव में उपयोग की गई सामग्री या मिट्टी की कंपैक्शन (संपीड़न) प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई हो सकती है। यदि निर्माण गुणवत्ता में लापरवाही साबित होती है तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए संभावित खतरा बन सकती है।
संभावित खतरा — बड़ी दुर्घटनाओं का आमंत्रण
अर्धकुंभ के दौरान हरिद्वार में लाखों की भीड़ उमड़ती है। गंगा घाटों पर श्रद्धालु एक साथ उतरते हैं, स्नान करते हैं, आरती में भाग लेते हैं। ऐसे में यदि नींव कमजोर रही तो थोड़े से कंपन, अधिक भार या जलस्तर बढ़ने से घाटों में दरारें और धंसाव भयावह दुर्घटनाओं को जन्म दे सकते हैं।
इतिहास गवाह है कि भीड़ प्रबंधन और ढाँचागत कमजोरी किसी भी मेले को हादसे में बदल सकती है। इसलिए हरिद्वार प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती “गुणवत्ता के साथ सुरक्षा” सुनिश्चित करना है।
जनता और विशेषज्ञों की राय
स्थानीय निवासियों और निर्माण विशेषज्ञों का कहना है कि घाटों का निर्माण केवल सौंदर्य के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग की दृष्टि से भी मजबूत होना चाहिए। यदि निर्माण कार्य में जल्दबाजी या लागत घटाने के लिए निम्न गुणवत्ता की सामग्री प्रयोग की गई है, तो यह आने वाले समय में भारी कीमत मांग सकती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि हर घाट का “स्ट्रक्चरल ऑडिट” कराना अब आवश्यक हो गया है।
सुधार की दिशा — जिम्मेदारी और पारदर्शिता जरूरी
अर्धकुंभ जैसे आयोजन केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जुड़े होते हैं। इसलिए निर्माण एजेंसियों से लेकर निगरानी अधिकारियों तक सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हर कार्य का थर्ड पार्टी ऑडिट, सामग्री की लैब टेस्टिंग और नियमित निरीक्षण ही इस खतरे से बचा सकते हैं।
अर्धकुंभ मेला श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है, लेकिन यह तभी सुरक्षित रहेगा जब इसकी नींव मजबूत होगी — केवल पत्थर और सीमेंट की नहीं, बल्कि ईमानदारी और पारदर्शिता की। यदि अभी से सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ये दरारें केवल घाटों में नहीं, बल्कि व्यवस्था के भरोसे में भी पड़ जाएँगी।



