नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में वक्फ (संशोधन) कानून, 2025 को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक अहम अंतरिम आदेश दिया है। कोर्ट ने कानून के एक विवादित प्रावधान पर रोक लगाई है, लेकिन पूरे कानून पर स्टे लगाने से इनकार कर दिया है। यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता, संविधानिक अधिकारों और अल्पसंख्यक संस्थाओं के अधिकारों के बीच संतुलन की मिसाल बन गया है।
क्या है वक्फ संशोधन कानून?
वक्फ एक्ट 1995 को संशोधित करते हुए केंद्र सरकार ने 2025 में नया वक्फ संशोधन कानून लागू किया। इस कानून में कुछ प्रमुख बदलाव किए गए थे, जैसे:
- वक्फ बनाने वाले व्यक्ति को कम से कम 5 वर्षों से इस्लाम का अभ्यास करने की अनिवार्यता।
- ‘वक्फ बाय यूज़र’ की अवधारणा को सीमित करना।
- वक्फ बोर्डों की नियुक्तियों और अधिकारों में बदलाव।
इन प्रावधानों को लेकर कई नागरिकों और संगठनों ने कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। उनका कहना था कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 का उल्लंघन करता है, जो समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के संचालन के अधिकार की गारंटी देता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: किन बातों पर रोक?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
- पूरे कानून पर स्टे लगाने का कोई ठोस आधार नहीं है।
- लेकिन, “5 साल इस्लाम प्रैक्टिस” करने की शर्त पर अंतरिम रोक लगाई जाती है।
- इसके अलावा कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि विवादित प्रावधानों को तब तक लागू न किया जाए, जब तक इस मामले पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता।
इसका मतलब यह हुआ कि फिलहाल वह व्यक्ति भी वक्फ बना सकता है जिसने हाल ही में इस्लाम धर्म अपनाया हो।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“कोई भी कानून संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। यदि किसी प्रावधान से किसी व्यक्ति या समुदाय के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो कोर्ट उसमें हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य है।”
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को “संवैधानिक मान्यता” प्राप्त होती है और उन्हें तुरंत खारिज नहीं किया जा सकता जब तक कि उनका स्पष्ट उल्लंघन न दिखे।
आगे क्या?
यह मामला अब पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। आने वाले समय में:
- संविधान पीठ इसका अंतिम निर्णय करेगी।
- सरकार को अपना विस्तृत पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा।
- सभी संबंधित पक्षों की दलीलों को सुना जाएगा।
निष्कर्ष
वक्फ कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दर्शाता है कि भारत में कानून और संविधान के बीच संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है। यह मामला धार्मिक संस्थाओं, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और विधायी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता को लेकर आने वाले समय में और भी बहस का विषय बनेगा।



